Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 15, 2010

हाइकू

  1. ईश्वर

    ईश्वर हुआ लापता
    बुद्धु मुज़रिम और मक्कार
    निकले ढूंढ़ने

    2. कवि

    कविता तो लिखता है
    लेकिन फिर वह पागल जैसा
    बेज़ा हँसता है

    3. देशभक्त

    देशभक्त बीमार
    अमरीकी अस्पताल में
    है मरने को तैयार

    4. राजनीतिज्ञ

    धंधा नहीं ख़राब
    मुल्क भले कंगाल हो
    वह तो है नवाब

    5. चोर

    यह कैसा बग़दाद
    छोटे चोर जेलों में
    बड़े चोर आज़ाद

  2. 6. आलोचक

    लेखक नाकामयाब
    बनता है लेकिन आलोचक
    नाम का कामयाब

    7. दूध वाला

    जो खीर पिए सो वीर
    एक दूध में पानी है
    दूसरा पानी में दूध

    8. छड़ा

    है शादी की चाह
    पर शादी न करने का
    दुगुना उत्साह

    9. दुकानदार

    दुखी दुकानदार है
    नब्बे प्रतिशत नफ़ा भी
    क़तई नागवार है

    10. गुल्ली-डंडे का खिलाड़ी

    गुल्ली-डंडे का खेल
    रखे ओलिम्पिक में
    खुले भाग्य हिन्द के

    11. फ़क़ीर

    फ़क़ीर की औक़ात
    पाँच रुपयों से कम क्या
    चाहिए नहीं ख़ैरात

    12. मसानी

    ईश्वर अन्यायी
    आज पूरे शहर से
    एक अर्थी न आई

    13. कौआ

    काँव-काँव करता कौआ
    आया चल कोयल के पास
    सीखो गाने का अंदाज़

    14. मेंढ़क

    घूमता है चौतरफ़
    मेंढ़क बैठा कुएँ में
    इतना नन्हा-सा संसार

    15. नाग

    कैसा देते हो क्षीर
    सँपेरे से कहा साँप ने
    आधा है इसमें नीर

    सिन्धी से अनुवाद : मोहिणी हिंगोराणी

Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 11, 2010

नो डिस्क इन्सर्टेड

लालू  :कल रात तीन घंटे एक फिल्म देखी, जिसमें न कोई फोटो था और न ही कोई आवाज़?

कालू : फिल्म का नाम क्या था?

लालू :नो डिस्क इन्सर्टेड !

१. वचन

आज तीन कुटुंब मंदिर के बाहर मातम मना रहे हैं. कालू और नीतू की लाशें मंदिर के सामने रखी हुई हैं. कल ही तो मोहन और नीतू की शादी हुई थी और आज ही उनके सब अरमान उस आग की लपटों में जल कर राख हो जायेंगे. मोहन बार बार नीतू के पिता से कहे जा रहा था..  “अंकल दोषी आप हैं जो नीलू की शादि कालू से न करवाकर उसकी ज़िंदगी की डोर मेरे साथ बाध दी. मुझे नीलू एक बार भी दिल की बात बताती तो मैं खुद उसकी शादी कालू के साथ करवा देता.

कालू के पिता पर बार बार मूरछा हावी हो रही थी. उसके एक मात्र पुत्र  ने नीलू के प्यार में खुद को कुर्बान कर दिया. नीलू और कालू मेडिकल कालेज मेंसाथ पढ़ते रहे और साथ साथ ज़िंदगी गुज़ारने और साथ जीने मरने के वादे कर बैठे. नीलू के बाप के पास बेशुमार दौलत थी, जिसके बलबूते पर उसने एक उध्योगपति से अपनी बेटी की शादी करा दी, पर आज नीलू उनसे भी हमेशा के लिये मुँह मोड़कर चली गई. कालू और नीलू ने एक दूसरे को दिया वचन पूरा किया.

सँगीता १९९८

॰॰

२. गर्जना

ओहदे का नशा अच्छे भले को मंझदार में धकेल देता है, फिर भला माणिक लाल किस खेत की मूली था. बिच्चारा ३२ साल क्लर्क की हैसियत से काम करते बेज़ार हो गया था. मैनेजमेंट मेम्बेर्स के आगे हाथ जोड़ना, अपने बस में जितनी सेवा करने की क्षमता थी वो करके, अच्छे काम करने के वादे करके किसी तरह सुपर्विसेर की कुर्सी हाथ की. उसके पक्के होने की बात तक बाहर न आने दी और न ही कर्मचारियों को भी कुछ पता चलने दिया.

जब बात पाकी जब हुई तो ऐलान हुआ, पार्टियां दीं, कुछ कर्मचारिओं को अपना दायाँ और बायाँ हाथ चुना. माणिक लाल बहुत खुश था. उसका असली रंग भी दिखाई देने लगा. उसका शकी स्वाभाव, हर काम से नुख्स निकलना, थोड़ी ग़लती पर कर्मचारियों को बुलाकर उनपर कुर्सी का रौब जमाना, मतलब यह कि उसने तंग करने के तरीके अख्तियार किये. शोर करने वाले सब शेर तो नहीं हो सकते , पर बचाव के रास्ते तंग होने लगे. एक गुफा में इतनी आवाजें! किसकी आवाज़ सुनी जाय?  गर्जना की आवाज़ बढ़ रही थी. देखें आगे आगे आगे होता है क्या???

अनुवादः देवी नागरानी

साभारः संगीता जानवरी १९९८

Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 11, 2010

फैसला

कोर्ट के चेम्बर में आते ही अपनी कुर्सी पर बैठते उस स्मार्ट ईमानदार जज ने कहा-

” तो आप दोनों ने मुझे रिश्वत दी है”

सुनते ही दोनों वकीलों के चहरे उतर गए.

” तो वकील मोहंत जी आपने मुझे रु. ५,००,००० दिए हैं और वेंकट जी आपने मुझे रु. ६,००,००० दिए हैं.”

अब जज का हाथ अपनी जेब तक गया और उसने रु.१,००,००० निकाल कर वेंकट की ओर बढ़ाते हुए कहा.” अब जब की मैं आपको १, ००, ००० लौटा रहा हूँ, हम यह केस अब निरपक्ष भाव से तय करेंगे.”

अनुवाद: देवी नागरानी. From Internet

Posted by: Devi Nangrani | آڪٽوبر 16, 2010

सिंधी ज़बाँ चाहिये

ग़ज़लः

हमें अपनी सिंधी ज़बाँ चाहिये

सुनाए जो लोरी वो माँ चाहिये

 

कहा किसने सारा जहाँ चाहिये

हमें सिर्फ़ हिन्दोस्ताँ चाहिये

 

जहाँ सिंधी भाषा के महकें सुमन

वो सुंदर हमें गुलसिताँ चाहिये

 

 

जहाँ भिन्नता में भी हो एकता

मुझे एक ऐसा जहाँ चाहिये

 

मुहब्बत के बहते हों धारे जहाँ

वतन ऐसा जन्नतनिशाँ चाहिये

 

तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ

निगाहों में वो आसमाँ चाहिये

 

खिले फूल भाषा के देवी जहाँ

उसी बाग़ में आशियाँ चाहिये.

देवी नागरानी

 
 
Posted by: Devi Nangrani | February 21, 2010

सिंध मुंहजी अमाँ

सिंध मुंहजी अमाँ , सूंह तुन्हजीअ मथाँ 

छा लिखी छा लिखाँ , छा लिखी छा लिखाँ  

हिकु क़लम हिकड़ो माँ , कीअ पूरो पवाँ 

छा लिखी छा लिखाँ , छा लिखी छा लिखाँ

 

Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 24, 2013

“शिशु” -Ravindranath Tagore

Tagore
‘रविन्द्र नाथ टैगोर’ के “शिशु” बाल संग्रह से कुछ कविताएं सिन्धी अनुवाद: देवी नागरानी
1 ॰ हिक कागर जी कश्ती मोकलुन में रोज़ रोज़ पाणीअ में वहाईंदो आहयाँ हिक कागर जी कश्ती थुल्हन थुल्हन अखरन में पहिंजो नालो बि लिखंदो आहयाँ ! ऐं कहिड़े गोठ में घरु आहे, इहो बि, उम्मीद आहे को न को किथे, कंहि अनजाण जगह ते डिसंदो त जाणदो मां केरु आहियाँ कंहि मोकली आहे हिक कागर जी कश्ती !
२॰ पूर्णिमा जे चंड खे डिसन तुहिंजी अख्युन में लुड्क छो लड़ी आया आहिन बाबा? छा कंहि कुछ चयो तोखे? मुखे साफ़ साफ़ बुधाइ त जे लिखंदें, तुहिंजे हथन ऐं मुंह ते मसु लगी वई आहे, त तोखे गंदों चवन्दा छा? अरे छी छी, इहो चवण छा मुनासिब आहे? जे गंदों चवन, त पूर्णिमा जे चंड खे डिसन !
3. बालपण बार, माऊ खे सडु करे पुछो –“अम्मा — किथा आयो होस मां ? ऐं तोखे किथे मिल्युस ? कुछ रुअंदे कुछ खिलन्दे अम्मा- छातीअ सां लगाए चयो हो- ’ख्वाइश बणजी तूँ आयो हुएँ, ऐं तूँ मुहिंजे मन में रमजी व्यें तूँ मुहिंजे बालपण जे गुड्डन जी रांद में शामिल रहियें।
4. मां वडो थी व्यो आहियाँ मुखे त अञां वडो थियणों आहे मां नंढो आहियाँ अञां बारु ही चवंदा आहिन मां दादा खां वधीक मस्त ठहंदस वड़ो थींदसु –एतरो, जेतरो बाबा आहे अगर कडहिं, दादा पढ़हण न चाहे तोते जो पिंजरो खणी रांद करण चाहे दड़को डई उन्हन खे चवंदु हॅलो माठ करे विहो, ऐं व ञीं पढ़ो चवंदुस: “तूँ डाढ़ो बदमाश छोकरो आहीं वरी मां चवन्द्स : ‘माँ हाण नन्ढो न आहियाँ / मां बाबा जेडो थी व्यो आह्याँ”!

5. मां अख बंद करयां ‘ओए अम्मा! हाण मोकल डे न सुबुह खां वठी पढ़ी रह्यो आहियाँ मां ! तुहिंजे कमरे में वञीं
मां पढ़हण पढ़हण खेलींदुस ‘हींअर बिपहरी आहे’ बस चई छडयो तो । कंहि डींहु इएं न थो लगे-बिपहरन में मां अखि बंद करयां त, शाम थियण लगे !
6. छा लिखंदो आहे?
बाबा वेठो किताबु लिखंदो आहे छा लिखंदो आहे ? मुखे त कुछ ब समझ में न ईन्दो आहे उन डींहु तोखे पढ़ी पे बुधायाऊँ अम्मा सचु चइजांइ, छा कुछ समझो तो? ही सभ लिखण सां छा हासिल थींदों? केतरा न सुठा सुठा किस्सा बुधाईन्दी आहीं तूँ अहड़ो कुछ छो नथा लिखन बाबा, दादीअ अम्मा छा, बाबा खे राजाऊन जी का अखाणी कड़हिं न बुधाई? यां हुनन सभ विसारे छडयूं आहिन?

Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 24, 2013

प्यार-नफ़रत-Hemant

मूल: हेमंत कुमार सिन्धी अनुवाद: देवी नागरानी
प्यार-नफ़रत

अजु मूँ समूरी नफ़रत बर्फ़ सां ढकियल पहाड़ीअ ते लिखी छड़ी आहे, ऐं इंतज़ारु वेठो करयां सिजु निकिरण जो

Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 24, 2013

पोख-Nagarjun

Nagarjun

मूल: नागार्जुन सिन्धी अनुवाद: देवी नागरानी
7॰ पोख
हिक जी न, बिन जी न घणियुन बनियुन जे पाणीअ जो जादू, हिक जी न, बिन जी न, लख-लख कोटि-कोटि हथन जे छुहाव जी महिमा, हिक जी न, बिन जी न हज़ारि-हज़ारि बनियुन जी मिट्टीअ जा गुण धर्म:
पोख छा आहे ? ऊहा ब्यो कुछ त न आहे! नदियुन जे पाणीअ जो जादू आहे हथन जे छुहाव जी महिमा आहे कारी कारी चन्दन जाहिड़ी मिट्टीअ जो गुण धर्म: आहे सिज जे तिरिविरन जो रूपांतर आहे हवा जे थिरकण जे सिमटण जो संकोच आहे

Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 24, 2013

Sachu Ain Saaru-Vishnu Prabhakar

Vishnu-Pabhakar

मूल: विष्णु प्रभाकर अनुवाद: सिन्धी देवी नागरानी

1॰ कूड़

मूँ गुज़िरियल युग जी

कथा लिखी हुई

सा सचु न थी!

तूँ ईंदड़ पल जी

कहाणी प्यो लिखीं

सा बि सचु न थींदी

कालु सभिणी खे गिरहु ठाहींदो

बाक़ी रहजी वेंदो कूड़ों घमंडु

मुहिंजों, तुहिंजों, हुनजो,

तूँ जाणी थो कहिंजो

चऊ न, छो जो

तूँ जो बि चवंदें

सभ कूड़ हूंदों !

2

सचु ऐं सारु

शतरंज की बिसात ते

शिकस्त डई विरोधीअ खे

उन्हन मुरकियो

अजां मुरकियो

अजां मुरकियो

एतरो जो चीख़ बणिजी पई मुर्क तिनजी

सच खे बोली मिली न सघी

सा घुटजी पई उन्हन जे कंठ में

पर सारु इहो आहे

त सचु बाणजी पई मुर्क उन्हन !

*

3॰ वेझराई

जो पीढ़ा थो डे

सो खिले थो

जो पीढ़ित आहे

सो रोए थो

केतरी वेझराई आहे खिलण ऐं रुअण में !

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Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 24, 2013

मुहिंजों पतो-Amrita Preetam

Amrita Preetam
33. मुहिंजों पतो
अजु मूँ घर जो नम्बर मटायो आहे ऐं घिटीअ जे मथे ते लगलु घिटीअ जो नालो हटायो आहे ऐं हर हिक रस्ते जी दिशा खे, उघी छडियो आहे पर, जे तव्हांखे मुखे हरू-भरू पाइणों आहे त हर देश जे , हर शहर जे हर घिटीय जो दरु खड़खड़ायो, हीऊ हिकु परातो आहे ऐं जिते बि आज़ाद रूह सां मुहाखड़ो थिये समिझिजो उहो मुहिंजों घरू आहे !
मूल:अमृता प्रीतम अनुवाद: देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 20, 2013

खाली पेट-Abhimanyu Anat

Abhimanyu Anant
लेखक: अभिमन्यु अनत. सिन्धी अनुवाद: देवी नागरानी
35. कविता: खाली पेट
तो मांणहुन खे खाली पेटु डिनो
सुठो कयुइ !
पर, ऐ क़िस्मत हिकु सवालु आहे!
खाली पेट वारन खे
तो गोढ़ा छो डिना ?
उन्हन ताईं डिघेरण वारा हथ छो डिना?
*
हिन्दी में: खाली पेट
तुमने इन्सानों को खाली पेट दिया
अच्छा किया !
पर एक सवाल है ऐ क़िस्मत!
खाली पेट वालों को
तूने आँसू क्यों दिये?
उन तक पहुँचने वाले हाथ क्यों दिये?
साभार: हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कवितायें , संपादक: बच्चन

Posted by: Devi Nangrani | February 13, 2013

प्रेमचंद, बच्चन ऐं पाणी

आगरा में हिक कवि सम्मेलन में हरिवंशराय बच्चन आमंत्रित हो. आयोजन जी अध्यक्षता उपन्यास सम्राट प्रेमचंद पे कई. बच्चनजे लाइ पाणी आयो, सो पासे में वेठल प्रेमचंद काँ पुछाईं “बाबूजी पाणी पियंदा?” मु्शी प्रेमचंद पहरीं पाणीअ डे निहारयो, पोइ बच्चन डे ब निहारयो. पोइ हिक शरारती मुस्कान साँ चयाईं, “तुहिंजे हथ साँ पाणी पियंदुस?” पोइ ब्ई ठहाको लगाए खिल्या, मंच जा माण्हूँ खेन डिसण लगा.

साभारः नवनीत, मुंबई, नवंबर २००९

अनुवादः देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | February 13, 2013

दुख का बोझ

पति सतसंग सुनकर घर लौटा

घर आते ही पत्नि को मुस्कराकर पुकारा. उसके आते ही उसे बाहों में उठा लिया और उसे उठाये हुए पूरे घर में फेरे लगाता रहा.

पत्नि बहुत हैरान होकर पूछने लगी..”क्या आज स्वामी ने प्यार का पाठ पढ़ाया है क्या?”

पति ने कहा…” नहीं नहीं, उन्होनें कहा है कि अपने बोझ और दुखों को मुस्कराकर उठाओ.”

अनुवादः देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | February 13, 2013

परहेज़

नब्बे साल के बुज़र्ग जीवतराम से एक डाक्टर ने पार्टी में पूछ. “उतनी बड़ी उम्र तक तंदुरुस्त रहने के लिये तुमने सब से ज़ियादा परहेज़ किससे की .”

“डाक्टरों से” जीवतराम ने जवाब दिया

(‘न्यू सिन्धी लॉफिंग क्लब’ से)

अनुवादः देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | February 13, 2013

मैं भी अनपढ़ हूँ।

मशहूर विज्ञानी अलबर्ट आइन्सटाइन ने एक बार किसी होटल में गया. वेटर उनके सामने मेनूकार्ड लेकर आया. आइन्सटाईन अपनी जेब टटोलने लगा, चश्मा तो घर भूल आए थे. यह बात ध्यान में आते ही उसने वेटर को बुलाकर कहा ” भाई मेनूकार्ड तुम ही पढ़कर सुना दो।”

उसपर वेटर शर्मिंदगी के आवाज़ में कहा, ” सॉरी सर, मैं भी आपकी तरह अनपढ़ हूँ।”

(‘न्यू सिन्धी लॉफिंग क्लब’ से)

अनुवादः देवी नागरानी

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