Posted by: Devi Nangrani | آڪٽوبر 16, 2010

सिंधी ज़बाँ चाहिये

ग़ज़लः

हमें अपनी सिंधी ज़बाँ चाहिये

सुनाए जो लोरी वो माँ चाहिये

 

कहा किसने सारा जहाँ चाहिये

हमें सिर्फ़ हिन्दोस्ताँ चाहिये

 

जहाँ सिंधी भाषा के महकें सुमन

वो सुंदर हमें गुलसिताँ चाहिये

 

 

जहाँ भिन्नता में भी हो एकता

मुझे एक ऐसा जहाँ चाहिये

 

मुहब्बत के बहते हों धारे जहाँ

वतन ऐसा जन्नतनिशाँ चाहिये

 

तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ

निगाहों में वो आसमाँ चाहिये

 

खिले फूल भाषा के देवी जहाँ

उसी बाग़ में आशियाँ चाहिये.

देवी नागरानी

 
 
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Responses

  1. Dear Sir,

    I Like your Ghazals, Pls. send some of your choice ghazales related to describing sindusim and indian nationality.

    Regards,

    Sanjay N. Khemani
    M: 9408491601
    Email: khemani1981@hotmail.com

  2. आदरणीया देवी नागरानी जी,

    बहुत सुन्दर गज़ल है. आपकी गज़लों में देशप्रेम लगातार प्रतिभाषित होता है. हार्दिक शुभकामनाएं.

    चन्देल

  3. very nice devi ji

  4. आपकी इस कामना में हमें भी साथ ही समझिये!


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