Posted by: Devi Nangrani | ڊسمبر 23, 2010

आज भी इम्तिहान वो ही है

सिन्धी शायर अर्जन हासिद की ग़ज़ल

आज भी इम्तिहान वो ही है

तुझपे मुझपे गुमान वो ही है

कैसे कह दूं की गुल खिले न खिले

ज़हन में बागबान वो ही है

जिस भी अहसास को छुआ मैंने

यूं लगा महरबान वो ही है

चहरे पे झुर्रियां वही की वही

माथे पर भी निशान वो ही है

तेरी मुस्कान, मेरे अश्कों में

दर्द और दास्तान वो ही है

है न पहचान, फिर भी आँखों में

सार वो ही बयान वो ही है

यूं तो ‘हासिद’ है सारी धरती पर

दिखता इक आसमान वो ही है

अनुवाद: देवी नागरानी

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Responses

  1. भर भर शराबे-हुस्न के प्याले हूँ पी रहा
    आँखों की प्यास मेरी अभी बरकरार है
    gaagar se saagar chalak raha hai. Bahut Khoob
    Devi nangrani


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