Posted by: Devi Nangrani | مارچ 22, 2011

“हिंदी साहित्य बनाम प्रवासी हिंदी साहित्य”

श्री रूपसिंह चँदेल जी के ब्लाग पर http://www.vaatayan.blogspot.com/

हिंदी साहित्य बनाम प्रवासी हिंदी साहित्य” नाम का लेख पढ़ा और साथ में यू.के. के वारिष्ट ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की यह रचना, जिसने सोच में फिर से तहलका मचा दिया

“साहित्य के उपासको, ए सच्चे साधको

 

“कविता कथा को तुमने प्रवासी बना दिया

मुझको लगा कि ज्यों इन्हें दासी बना दिया ”

प्रसव पीड़ा की गहराई और गीराई उनकी इस रचना में महसूस की जाती है जब देश के बाहर रहने वाले सहित्यकार को प्रवासी के नाम से अलंक्रित किया जाता है. क्या कभी अपनी मात्र भाषा भी पराई हुई है? कभी शब्दावली अपरीचित हुई है? इस वेदना को शब्दों का पैरहन पहनाते हुए वे भारत माँ की सन्तान को निम्मलिखित कविता में एक संदेश दे रहे है….

यही परम सत्य है, अनुज नीरज का कथन “शब्द, भाव प्रवासी कैसे हो सकते हैं?

ये तो सबके लिए हैं…साहित्य को चार दीवारों में बाँध कर नहीं रखा जा सकता, . क्या देश से दूर परदेस में जाने से रिश्तों के नाम बदल जाते हैं. अगर नहीं तो प्रवासी शब्द किस सँदर्भ में उपयोग हो रहा है. भाषा का विकास हमारा विकास है, और यह सिर्फ देश में ही नहीं यहाँ विदेश में भी हो रहा है इसको नकारा नहीं जा सकता. इस बात को लेकर अनेक अभिव्यक्तियां अपने विचारों सहित सामने आयीं हैं . “व्यक्ति प्रवास करता है, कविता नहीं। कविता तो हृदय की भाषा है” इस कथन की गहराई में एक पीड़ा अंगड़ाई ले रही है, उसे महसूस करना है. जाता है. लेखक सोच के ताने बने बुनता है हिंदी में, लिखता है हिंदी में, पर वह साहित्य प्रवासी  कहलाया जाता है . ऐसे लगता है जैसे भाषा को ही बनवास मिल गया है.!! साहित्य कोई भी हो, कहीं भी रचा गया हो, अगर हिंदी में है तो निश्चित ही वह हिंदी का साहित्य है.

   द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारिशस में प्रस्तुत डॉ. ओदोलेन स्मेकल के भाषण के एक अंश में हिन्दी-राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता के संदर्भ में कहा था- ”मेरी दृष्टि में जो स्वदेशी सज्जन अपनी मातृभाषा या किसी अपनी मूल भारतीय भाषा की अवहेलना करके किसी एक विदेशी भाषा का प्रयोग प्रात: से रात्रि तक दिनों दिन करता है, वह अपने देश में स्वदेशी नहीं, परदेशी है।” अगर यह सच है तो प्रवास में हिंदी साहित्य लिखने वाला भारतीय प्रवासी कैसे हो सकता है? तमिलनाडू हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष डा॰ बालशौरि रेड्डी का इस विषय पर एक सिद्धाँतमय कथन है “हिंदी का साहित्य जहाँ भी रचा गया हो और जिसने भी रचा हो, चाहे वह जंगलों में बैठ कर लिखा गया हो या ख़लिहानों में, देश में हो या विदेश में, लिखने वाला कोई आदिवासी हो, या अमेरिका के भव्य भवन का रहवासी, वर्ण, जाति धर्म और वर्ग की सोच से परे, अपनी अनुभूतियों को अगर हिंदी भाषा में एक कलात्मक स्वरूप देता है, तो वह लेखक हिन्दी भाषा में लिखने वाला क़लमकार होता है और उसका साहित्य जिस भाषा में भी रचा होगा वह उसी भाषा का साहित्य कहलायेगा.”
हर रिश्ता मान्यता की बुनियाद पर मुक्कमिल पाया जाता है
 
गर्भनाल के ३७ अंक में रेनू राजवंशी गुप्ता का आलेख “अमेरिका का कथा-हिंदी साहित्य” पढ़ा. हिंदी भाषा को लेकर जो हलचल मची हुई है वह हर हिन्दुस्तानी के मन की है, जहाँ कोई प्रवासी और अप्रवासी नहीं, बस देश और देश की भाषा का भाव जब कलम प्रकट करती है तो जो मनोभाव प्रकट होते हैं उन्हें किसी भी दायरे में कैद करना नामुमकिन है. न भाषा की कोई जात है न लेखन कला की. रेणुजी का कथन “हिंदी लेखकों ने कर्मभूमि बदली है” इस बात का समर्थन है!
साहित्य कोई भी हो, कहीं भी रचा गया हो, अगर हिंदी में है तो निश्चित ही वह हिंदी का साहित्य है.
देवी नागरानी

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ख़ुशबू कभी क्या किसी दाइरे में क़ैद हुई!! भारत माँ हमारी जन्मदातिनी है
सूरज की रोशनी की तरह भाषा पर हर हिंदोस्तानी का उतना ही अधिकार है जितना एक बालक का माँ की ममता पर होता है. ये उसका हक़ है और इस विरासत को उससे कोई नहीं छीन सकता!. पानी पर लकीरे खींचने से क्या पानी अलग होता है? साहित्य और समाज का आपस में गहरा संबंध है. एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, एक का प्रभाव दुसरे पर अनिवार्य रूप से पड़ता है- दोनों एक दूसरे के निर्माण में सहयोगी हैं. इसमें भारतीय संस्कृति की आत्मा की संवेदनशीलता, उदारता, सदाचरण, एवं सहस जैसे मानवीय गुण हैं.

आदमी प्रवासी होता है, साहित्य नहीं. देस विदेस के बीच एक नयी उड़ान भरता प्रवासी साहित्य हर बदलती विचारधारा के परिवर्तित मूल्यों से परिचित कर रहा है, अपने विचार निर्भीकता से, स्पष्टता से और प्रमाणिकता से व्यक्त करके यथार्थ की परिधि में प्रवेश पाता है. प्रवास में रहकर यहाँ का लेखक दोहरी मान्यताओं तथा रोज़मर्रा के अनुभव को कलमबंद कर रहा है. इसमें क्या प्रवासी है? भाषा प्रवासी नहीं होती, सोच प्रवासी नहीं होती तो अभिव्यक्ति कैसे प्रवासी नाम से अलंकृत हो सकती है? किसी भाषा में समुचित योग्यता के विकास के लिए उस भाषा पर कार्य करना तथा उस भाषा का नियमित प्रयोग करना अनिवार्य है. पर यहाँ तो बात हमारी मात्रभाषा और राष्टभाषा हिंदी की है. हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है.

हिंदी का विकास हो रहा है और बढ़ावा मिल रहा है उसमें प्रवासी भारतीयों की भागीदारी बराबर रही है. दर असल साहित्य एक ऐसा लोकतंत्र है जहाँ हर व्यक्ति अपनी कलम के सहारे अपनी बात कह और लिख सकता है, यह आज़ादी उसका अधिकार है..हाँ नियमों की परिधि में रहकर! लेखक का रचनात्मक मन शब्दों के जाल बुनकर अपने मन की पीढ़ा को अभिव्यक्त करता है. लिखता वह अपने देश की भाषा में है, पर परदेस में बैठकर, और उसे प्रवासी साहित्य कह कर सुशोभित किया
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