Posted by: Devi Nangrani | اپريل 2, 2011

देखने वाली खिड़की

एक जवान दम्पति नई जगह आकर रहने लगे .
दूसरी सुबह जब वे नाश्ता कर रहे थे , तब उस नौजवान पत्नी ने अपनी पड़ोसन को धुले हुए कपड़े रस्सी पर सुखाते हुए देखा.
” उसके कपडे ज़ियादा साफ़ नहीं लगते” उसने कहा. ” शायद उसे सही ढंग से  धोना नहीं आते,  या तो उसे बेहतर साबुन की ज़रुरत है.”
उसके पति ने उसकी ओर देखा, पर वह चुप रहा.
हर सुबह नौजवान पत्नी वही टिप्पणी किया करती थी. लगभग एक महीने के बाद वह औरत आश्चर्यचकित रह गई जब उसने रस्सी पर साफ़ सुथरे धुले हुएकपड़े देखे.
कहने कगी ” आखिर वह कपड़े धोना सीख ही गई. जाने किसने उसे यह सिखाया.”
पति ने मुस्कराकर  कहा “आज मैं सुबह जल्दी उठा और इस  खिड़की के शीशे  साफ़ कर दिए” 
यही सब ज़िन्दगी के साथ होता है. हम अपने आस-पास जो भी देखते हैं वह सब हमारी देखने वाली खिड़की की साफगोई पर निर्भर है.

अनुवाद: देवी नागरानी
(नेट से )

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