Posted by: Devi Nangrani | اپريل 4, 2011

अदम्य जीवन-शक्ति के वारिस हैं सिन्धी

सिन्धु के प्रवाह में जन्मी हैं सिन्धी संस्कृति
विभाजन के रेगिस्तान में रास्ता बनता आ रहा है सिन्धी साहित्य
सिन्धी, सिन्धु नदी के मानव जाति के वंशज हैं. सिन्धु नदी के तट पर रचित वेदों-ग्रंथों की महान और आदर्श संस्कृति और सभ्यता हमारे ही पूर्वजों की देन हैं. वैदिक- संस्कृति की नींव रखने वाले सिन्धु सभ्यता के ही लोग है.
संसार के इतिहास में कठिन परिस्थितिओं में भारतीय पलायन नहीं हुआ जैसा भारत -विभाजन के वक़्त हुआ. यह अपने आप में एक अजीबो-ग़रीब इतिहास है जिसने जुड़वाँ ज़ख़्मी देशों को जन्म दिया और एक सम्पूर्ण जाति को दर-ब-दर की ठोकरें खाने को छोड़ दिया जो संसार की प्राचीनतम गौरवपूर्ण संस्कृति की जन्मदाता और वारिस हैं. इसे राजनीतिक कूटिनीति कहें, इतिहास की भूल कहें, जानबूझकर दिया गया चल कहें, कुछ भी…!!पर यह सभी ने देखा कि अपने समृद्ध घर, व्यापार खेती, ज़मींदारी, सुख-वैभव छोड़कर एक काफिला साहित्य और संस्कृति तथा कष्टों और दुखों की गठरी लिए अनजान दिशाओं में चल पड़ा. हिन्दुस्तान में शरणार्थी दौर में मानो उनकी ज़िन्दगी ठहर गयी. फिर तो शुरू हुआ एक दौर, खुद को स्थापित करने का, जिसमें अपनी भाषा-संस्कृति सब टूटता हुआ सा लगा. सिंध की साहित्यक विरासत वहीँ रह गयी. ज़मीन के साथ साथ रीति-रिवाज़, मान्यताएं, सांस्कृत आनंद सब कुछ उनके सतीत्व के साथ सिन्धु की लहरों में डूबता-उतरता रहा. विभाजन की पीड़ा उनके तन से, मन से जुड़ी रही और नई ज़मीन पर बस जाने के बावजूद भूलकर भी नहीं भूल पाए सिंध से बिछड़े सिन्धी लोग. अपनी जड़ से उखाड़ने व बिखरने के ग़म में शरणार्थी एक अरसे तक अपनी भाषा को नज़र अंदाज़ करने के बावजूद, फिर से रचनात्मक ऊर्जा के संचार के तहद लिखी रचनात्मकता से सिन्धी अदब को एक नया क्षितिज बख़्शने में कामयाब रहे. किसी भी कौम के अदब के माध्यम से एक प्रान्त के रहवासिओं की पूरी रूमानी, इख्लाकी सामाजिक, और सभ्यता-संस्कार भरी ज़िन्दगी की तस्वीर सामने नज़र आती है. इसी इल्मी-खज़ाने और तहज़ीब के वारिस सिन्धी भाषी, जदो-जहद से अपनी संस्कृति और भाषा को आगे बढ़ाने के प्रयासों में जुटे रहे.
जिस तरह हिंदुस्तान कि प्राकृतिक भाषाओँ की माँ संस्कृत मानी जाती है, उसी तरह सिन्धी भाषा भी असल में संस्कृत की बेटी है. वक्त ने जो मंज़र सिंध में बसे वासियों को दिखाए वो उनकी राहों में लम्बे अरसे तक हाइल रहे. एक तरफ से बनवास का दौर और फिर नए सिरे से ख़ुद को बसाने के प्रयास जारी रहे. विभाजन के पश्चात आज तक सिन्धी कौम को कोई प्रान्त नहीं हासिल. जड़ से जुदा होकर अपने जीवन को संचारित रखना, तमाम मुश्किलों के बावजूद भी उनके लिए स्थापित होना कठिन ज़रूर था पर नामुमकिन कुछ भी न था. कोशिशें होती रही और आज ६३ वर्षों के बाद जो तस्वीर दिखती है वह कहीं उदास करती है तो कहीं तसल्ली देती है. हर हाल में जिंदा रहने की क़सम खाकर, सिन्धी हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं. व्यापार उनके ख़ून में है, ज़िंदादिली उनके सीने में है. गिर-गिर कर उठ खड़े होना उनका दिमाग़ी फितूर है. सिन्धु नदी उनके दिल की धड़कन है, झूलेलाल की झलकी, शाह, स्वामी, सचल का काव्य उनकी अध्यात्मता है. ज़मीन नहीं है पर हिंद कि हवाओं में सिंध कि खुशबू सांसों में भरना उनका जीवन है.
और इन प्रयासों में एक सफ़ल और सशक्त कड़ी है साहित्य जो अपने आप को अपनी अरबी लिपि में अभिव्यत करता चला आ रहा है.. नौजवान पीढ़ी इस सिलसिले को देवनागिरी लिपि में आगे बढ़ा रही है. एक और प्रयास अपने वंशजों की दौलत आज की पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए अनुवाद के माध्यम से सिन्धी साहित्य अब प्रवाहित हो रहा है, जिसमें योगदान दे रहे हैं सिंध के, हिंद के वरिष्ट लेखक, शायर और पत्रिकारिता के जाने माने स्तंभ जिनकी सकारात्मक निष्काम सेवा भाव से सिन्धी साहित्य को प्रवाहित होने से कोई नहीं रोक सकेगा.
देवी नागरानी
११ सितम्बर, २०१० न्यू जर्सी

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