Posted by: Devi Nangrani | اپريل 4, 2011

कर्फ्यू

 सिंधी लेखक  आनंद टहलरामानी

शोर शराबा गुम

हलचल ग़ायब

चारों तरफ़ सन्नाटा

कोई बहरूपिया

मज़हबी लिबास ओढ़े

गुज़रा है शायद

हाथों में तस्बीह

(बग़ल में छुपी छुरी)

मुस्कराता चला जाता है

पीछे उसके

निर्दोश और निर्बल

बेबस और बेकस

इन्सानों का ख़ून बहता है

और तद् पश्चात ख़ामुशी

..

दूसरा बहरूपिया

यहाँ से निकला

धार्मिक जामा पहने

माथे पर लंबा तिलक लगाये

हाथों में रही माला उसके

(छुपा हुआ छुरा बाजू में )

और लबों पर जाप

गुज़र गया शहर से

पीछे उसके पाई

खून से सनी कुछ

कत्ल की हुई लाशें.

..

ख़ौफ़नाक लंबी ख़ामुशी

आगे चलकर

चलो दोनों चौराहे पर

ये मुलाँ, वो साधू

देखकर एक दूसरे को

दोनों मुस्कराए, खुशी जताई

अपनी अपनी कामयाबी पर

..

जागो सुजाग रहो

इन बहुरूपियों को पहचानों

ये मज़हबी मसीहा

वो धार्मिक गुरू

दोनों के चहरों से

उतारो नक़ाब

करो फाश राज़ उनका

नंगा करके

लटकाओ चौराहे पर!

 अनुवादः देवी नागरानी

साभारः संगीता अदबी मैगज़िन.जानवरी १९९८

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