Posted by: Devi Nangrani | مَي 23, 2011

भाषा हमारे अस्तित्व की पहचान है

भाषा का जन्म वेदों से हुआ है और वह हमारे अस्तित्व की पहचान है

. इन्सान मानव जाति का प्रतिनिधि है और भाषा माँ समान होती है. जननी मान का स्त्रोत्र कायम रखना है, यहजिम्मेवारी आज की नौजवान पीढ़ी की है जो इसे अपने साथ पनपने का, विकसित होने का, और फले फूले रहने का अनुदान करती रहे.

भाषा वह अनुस्वर है जिसके अंकुर निशब्दता के शब्द से ह्रदय में बोये जाते हैं , और वही बोल चाल के द्वारा, मनन चिंतन से अंकुरित व् विक्सित होते हैं. मनन चिंतन से अंकुरित व् विक्सित होते हैं. दुनियां में ऐसी कौन सी कौम है जिसमें उसकी अपनी निज भाषा और लिपि में कुछ न कुछ इल्म अदब या लिखित शास्त्रन होता हो. हाँ यह ज़रूर है की कहीं वह जियादा विक्सित व् मुखरित होता है, कही कहीं किसी पिछड़ी कौम का अदब उस कौम की हालात के मुताबिक होता है. कोई कितनी भी पिछड़ी कौम क्यों न हो, जियादा पढ़ी लिखी न सही,फिर भी उसके पास अपने पूर्वजों के अफसानों का, उनकी माहिरता का,ज़िन्दगी की गर्दिश की कशमकश में हिम्मत दिलाने वाले क़लाम की सूरत में ज़रूर कोई न कोई साहित्य, किसी सिऩ्फ में मौजूद होगा. ये साहित्य ही है जो इस मौजूदा दौर से आने वाले दौर के बीच एल पुल बना हैजो इन्सान की सच्ची रहबरी व् रहनुमाई करता है.

जिस तरह हिन्दुस्तान की प्राकृतिक भाषाओँ की माँ संस्कृत मानी जाति है

, उसी तरह सिन्धी भाषा भी असल में संस्कृत की बेटी है. वक्त ने कुछ ऐसे मंज़र सिंध में बसे वासिओं को दिखाए जो उनकी राहों में लम्बे अरसे तक हायिल रहे. विभाजन के पश्चात सिन्धी कौम को काफी अरसा बनवास भोगना पड़ा और फिर नए सिरे से खुद को बसाने के प्रयासों में जुट जाना पड़ा. अपनी जड़ से उखाड़ने व् उजड़ने के ग़म में एक अरसा अपनी भाषा को नज़र अंदाज़ करने के बावजूद फिर से रचनात्मक ऊर्जा के संचार के तहद लिखी गई रचनाओं से भाषा में स्फूर्ति आई. आज उन अदीबों की वजह से अदब को एक नया क्षितिज मिला है, जिसकी न कोई हद है न हिसाब. मुंशी प्रेमचंद जी का कथन है की अदब ज़िन्दगी की तफसीर हैकिसी हद तक ये ठीक ही है, क्योंकि किसी भी कौम के अदब के माध्यम से , एक प्रान्त के रह्वासिओं की पूरो रूमानी , इखलाकी, सामाजिक और सभ्यता संस्कृति भरी ज़िन्दगी की तस्वीर नज़र आती है. इसी इल्मी खजाने और तहजीब के वारिस सिन्धीभाषी, जड़ोजहद से अपनी संस्कृति और भाषा को आगे बढ़ने के प्रयासों में जुटे हैं.

हिंद

सिंध के विभाजन के पश्चात आज तक सिन्धी कौम को कोई प्रणय नहीं है. जड़ से जुदा होकर अपने जीवन को संचारित रखना, तमाम मुश्किलों के बावजूद भी उनके लिए कठिन ज़रूर था, पर नामुमकिन नहीं. तालीम का मूल मकसद है मौजूदा और आने वाली पीढ़ी के अंदर की जगी हुई लौ को उजगार करना , जो आगे चलकर अपनी कौम के लिए मशाल बने.

विभाजन के पश्चात सिन्धी भाषा की लिपि का मसाइल खड़ा हो गया

. अरबी लिपि का इस्तेमाल होते होते अब इस दौर की पीढ़ी के लिए लगभग सिमट रहा है. इसका मूल कारन है स्कूलों में सिन्धीका मात्रभाषा के रूप में न पढाया जाना. आजकल नया साहित्य अरबी एवं देवनागरी लिपि में चाप्य जा रहा है. आनेवाली पीढ़ी को मधेनज़र रखते हुए देवनागरी लिपि को बढ़ावा दिया जा रहा है. . कई रसाले देश भर में देवनगरी लिपि में निकले जा रहे है जिनमें अरबी लिपि का साहित्य देवनागरी में अनुदित करके जवान पीढ़ी तक पहुचाने का कार्य बखूबी किया जा रहा है.

देवी नागरानी

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