Posted by: Devi Nangrani | مَي 24, 2011

खुद शिकार हो गया

लेखक: चोइथराम  लालचंदानी  की कविता

खुद शिकार हो गया

इक सुहानी रात को

जब तारापति चन्द्रमा

अपनी सतह पर

नमूदार था

और मैं अपनी

दोनाली बन्दूक लेकर

शिकार के लिए

शिकार गाह की तरफ बढ़ा

रात के सन्नाटे में

जंगल में

पेड़-पौधों को चीरता 

सिन्धु का किनारा पकड़ के 

चलता रहा, चलता रहा

कुछ दूर जाकर

अचानक !!

सुरीली आवाज़ कानों से टकराई

शांत माहौल

सुनसान जगह

और मधुर आलाप !!

अजब लगा

और मैं

खिंचता चला गया उस

अलाप की तरफ.

जैसे ही

नज़र सामने पड़ी

एक हसीं नाज़नीन

सफ़ेद मखमल की खुशनुमा साड़ी में

लिपटी हुई

सिन्धु घाट पर

एक संगमर्री शिला पर बैठी

अपनी हसीं 

कोमल लम्बी लम्बी उँगलियों से

सितार के तार को

छेड़े गा रही थी

“श्याम तुझ बिन

कैसे गुज़ारे ये बिरह की रात”

और मैं

उस सुरीली आवाज़ से मुतासिर

शांत चित 

उसे सुनता रहा

सुबह की पहली किरण आई 

नाज़नीन गीत का

आखरी पड़ दोहराकर

सितार की तारों से

अपनी पतली-पतली उँगलियों को 

ढीला किया

एक घायल शिकार की तरह 

मैंने सर्द आह भरी

और

मुंह से बे-अख्तियार निकला

“वाह”

यूं महसूस किया

शिकार करने निकला था

पर खुद शिकार हो गया !

साभार: अदबी चमन (१९९७)

अनुवाद: देवी नागरानी

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