Posted by: Devi Nangrani | مَي 24, 2011

हम आपस में हैं भाई

सिन्धी लेखक नामदेव लाडला की रचना

हम आपस में हैं भाई

पर वे समझते नहीं

संस्कृति का जनाज़ा लिए 

सभ्यता के कब्रिस्तान की ओर

जा रहे है

भेष बदल रहे हैं

गुंडों, बदमाशों  को

दावतें दे रहे हैं, और

अपने सर पर बिठा रहे हैं

देश द्रोहियों को भी बख्श रहे हैं

कबूल कर रहे हैं वे

दावतें वहां, जहाँ

दरिंदों का नंगा नाच होता है

वहशत और दहशत के भी

शिकार हो रहे हैं हम

अपनी नाक कटवाकर

घूमने  को शायद

फ़क्र समझ रहे हैं

दौलत के ग़ुलाम बन कर 

इनके इशारों पे नाच रहे है

कठपुतली की तरह

शायद इन्होनें  

हमें सही पहचाना है

हमने नहीं !

अनुवाद: देवी नागरानी  

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