Posted by: Devi Nangrani | جُون 24, 2012

न इसमें सुखी मन

प्रभु वफा की नज़्म

न इसमें सुखी मन, न उसमें सुखी मन

नहीं इसमें राजी नहीं उसमें प्रसन्न

इकट्ठा है करता कुपट से यहाँ धन

कभी बन के बैरागी भटके है बन बन

सुमन रस है लूटे कभी बन के भँवरा

कभी बन पतँगा करे खुद को अर्पन

कभी ये खुशी में न फूला समाए

कभी ये उदासी में आँसू बहाए

अजब मन की रचना अजब मन की माया

अजब जिस अणू से हुआ इसका सरजन

न बोले जो मैना लगे खाली ये तन

बिना गँध महके न फूलों का दामन

अगर मन की मुखड़ी  महक लाए तन में

तो महका रहे उसका सारा ये जीवन

उसी मन में दोनोँ हैं  नरक  भी स्वर्ग भी

यही मन चिता भी, यही मन सिँघासन

यही मन है गहना गले की ये फाँसी

यही मन सभी के है दुख सुख का कारण

नहीं सामने उसके छल वल है चलता

सभी से है कहता कहे जैसे दरपन

गगन से भी ऊँचा है सागर से गहरा

समझ ही न पाया कोई ये है क्या मन

अनुवादः देवी नागरानी

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