Posted by: Devi Nangrani | فيبروري 13, 2013

फैसला

कोर्ट के चेम्बर में आते ही अपनी कुर्सी पर बैठते उस स्मार्ट ईमानदार जज ने कहा-

” तो आप दोनों ने मुझे रिश्वत दी है”

सुनते ही दोनों वकीलों के चहरे उतर गए.

” तो वकील मोहंत जी आपने मुझे रु. ५,००,००० दिए हैं और वेंकट जी आपने मुझे रु. ६,००,००० दिए हैं.”

अब जज का हाथ अपनी जेब तक गया और उसने रु.१,००,००० निकाल कर वेंकट की ओर बढ़ाते हुए कहा.” अब जब की मैं आपको १, ००, ००० लौटा रहा हूँ, हम यह केस अब निरपक्ष भाव से तय करेंगे.”

(इनटर्नेट से ) अनुवाद: देवी नागरानी

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Posted by: Devi Nangrani | فيبروري 13, 2013

सुहानुभूति

सुहानुभूति   (लघुकथा)

कार्यालय में  बदली थी आयल नएँ  अधिकारीअ  ऐं उते जे वर्क शाप जे हिक अधिकारी रामू दादा जे विच में गरमागर्मीअ में बहस मुबाइसो हली रह्यो हो।

अधिकारी वक़्त ते कहिं  कम जे पूरे न थियण जे करे वडे आवाज़ में दड़का डई रह्यो हो-

“तूँ निहायत ही आलसी ऐं कम चोरु आहीं ।“

“डिसो साईं ! हिन तरह गारयूँ डियण जो तव्हाँ  खे को हकु  न आहे।“

“छो न आहे?”

“तव्हाँ  ब सरकारी नौकर आह्यो ऐं  माँ ब ।“

“चुप्प !”

“रड्यूं  न करयो!  मुहिंजे ट्रान्सफर खां वधीक तव्हां  कुछ ब नथा करे सघो।“

“ऐं उहो ई माँ थियणु न डींदुस।“

“तव्हाँ खे जो चवणों या पुछणों हुजे, लिखी चओ यां पुच्छो, माँ जवाब डई वठंदुस, पर हिन तरह तव्हाँ मुखे डांटे-फटकारे नथा सघो, न त ……..”

“माँ लिखति में कार्रवाई करे तुहिंजे बारन-बच्चन जे पेट ते लत न हणंदस। गलती तूँ थो करीं, त चालाकी  ब तोसांण ही कंदुस। तोखे जो करणों आहे … सो कर। समझइ ? ”
रामू लाजवाब थी करे, माठि  में कन्धु  झुकाए कार्यालय माँ बाहर निकरी आयो।
बाहिर बीठलन साथ्युन  सवलाईअ सां अनुमान लगायो त अजु घर वजण वक़्त साहब जी ख़ैर नाहे।  दादा उन्हन खे आइनो जरूर देखारींन्दा, जींअ हू वरी कहिंजी हिन तरह  बे-इज़्ज़ती न करे सघे।
एतरे में उन्हन बीठलन माँ कहिं  चयो- “दादा! लगे थो हिन खे ब सबकु  सेखारणों ही पवंदों। ”
“न रे न ! सबकु त अजु हुन  मुखे सेखारे छडयो आहे । हू फ़क़त पहिंजों अफसर ई न आहे,  पीउ ब आहे, जहिंखे मुखां वधीक मुहिंजे बारन जी चिन्ता आहे ।”
एतरो चई हू कम वारी  जगह  डांहु मुड़ी वयो।

लेखक: डॉ॰  सतीशराज पुश्करणा

अनुवाद: देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | جنوري 25, 2013

साफ़ दरी

हिकु जवानु जोड़ो नईं जगह ते अची रहण लगो. ब्ये डींहु सुबह जो नौजवान पत्नीअ पहिंजी पाड़े वारीअ खे कपड़ा सुकाईंदो डिसी घोट खे चयों ” हुन जा कपड़ा ख़ास अच्छा न था लगन. शायद हुन खे धुअण नथा अचन या हुन खे सुठे साबूण जी ज़रूरत आहे.”

घोट हुन डे निहारे वरी ब् चुप रह्यो. हूआ रोज़ उहा ई गाल्ह चवंदी हुई. हिक महीने खाँ पोइ हिक डींहु जडहिं रस्सीअ ते साफ सुथरा कपड़ा लटक्यल डिठाईं त हूव हैरान थी।

चवण लगी “आख़िर हूअ कपड़ा धुअण सिखी वई,  न जाण कहंखा सिखी आहे?”

घोटस मुस्कराए चयो ” अञु माँ सुबूह जल्दी उथ्युस ऐं हीअ खिड़िकी सफ़ा करे छडी अथम”

इहोई ज़िंदगीअ में थींदों आहे. असीं पहंजे आस‍पास जेको ब् डिसंदा आहयूं सो सभ असांजी दिसण वारी खिड़कीअ जी साफ़गोईअ ते मदार आहे.

नेट ताँ..अनुवाद

देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | جُون 24, 2012

किसी को छाँव और खुशबू

लेखक: प्रभु वफा 

ग़ज़ल

किसी को छाँव और खुशबू न दे दिल का सुमन मेरा

तो बहतर  है वो जलकर ख़ाक हो जाए चमन मेरा

यही इक आस है जीते जी काम आऊँ किसीके मैं

बइद मरने के काम आए तो लेना तुम कफ़न मेरा

दिखी इंसान के दिल पे लगी इंसान की चोटें

है आँखें आंसुओं से तर, भरा है आज मन मेरा

जुबां मेरी जुबां गर आम की बनती, जब तक

निक्कमी शायरी लगती, लगे ये सारा फ़न मेरा

नहीं दुख की शिकायत है, नहीं सुख का सावली मैं

फ़क़त इक अर्ज़ है मालिक, भला ककी र तू चलन मेरा

वफ़ा इन्सानियत  की रूह ज़िंदा आज अभी तक है

ज़माना खत्म होगा क्यों नहीं माने ये मन मेरा।

अनुवाद देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | جُون 24, 2012

न इसमें सुखी मन

प्रभु वफा की नज़्म

न इसमें सुखी मन, न उसमें सुखी मन

नहीं इसमें राजी नहीं उसमें प्रसन्न

इकट्ठा है करता कुपट से यहाँ धन

कभी बन के बैरागी भटके है बन बन

सुमन रस है लूटे कभी बन के भँवरा

कभी बन पतँगा करे खुद को अर्पन

कभी ये खुशी में न फूला समाए

कभी ये उदासी में आँसू बहाए

अजब मन की रचना अजब मन की माया

अजब जिस अणू से हुआ इसका सरजन

न बोले जो मैना लगे खाली ये तन

बिना गँध महके न फूलों का दामन

अगर मन की मुखड़ी  महक लाए तन में

तो महका रहे उसका सारा ये जीवन

उसी मन में दोनोँ हैं  नरक  भी स्वर्ग भी

यही मन चिता भी, यही मन सिँघासन

यही मन है गहना गले की ये फाँसी

यही मन सभी के है दुख सुख का कारण

नहीं सामने उसके छल वल है चलता

सभी से है कहता कहे जैसे दरपन

गगन से भी ऊँचा है सागर से गहरा

समझ ही न पाया कोई ये है क्या मन

अनुवादः देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | جُون 24, 2012

निकला रवि तो रात का

सिन्धी शायर नारायण श्याम की ग़ज़ल

ग़ज़ल

निकला रवि तो रात का अँधेरा तो गम हुआ

कम रौशनी है, ये तो अलग इक सवाल

है आई न मौत वक़्त पे, आई अभी तो क्या

पहले मुहाल जीना था, मरना है अब मुहाल

था कौन, आया था वो कहाँ से, गया कहाँ

देखा किसे? हयात बनी मुन्तज़र सवाल

किस काम से था जा रहा, चलता गया किधर

आया ख़याल किसका? बना श्याम बेखयाल

अनुवाद: देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | مَي 28, 2012

अनाथ

अनाथ (लघुकथा)

      रमा सोच में बुडल रही, पहिंजों पाण सां विढंदी रही। कशमकश जा ताना-बाना हुनखे जकडींदा रह्या, तय करण मुश्किल थे लगो. लक्ष्मण रेखा घर की दहलीज़ हुई! हिन पार जी दुनिया में रिश्तन जी घुटन हुई, हुन पार जी दुनिया में पाहिंजे ढंग सां जीयण जी आज़ादी. पर जीयण जी हीक कड़ी घर जी चौखट जे अंदर जुड़ियल हुई॰

      अनाथाश्रम में कमु कंदे- कंदे हुन जो मोह उते रहंदड़ बारन सां एतरों व्यो जो हूअ वढ़ीक वक़्त उते ही गुजारण लगी, रात देर सां घर ईंदी हुई, एं सुबुह सवेल ई कम ते हाली वेंदी हुई॰

      अजु त हद थी वई . 10 वगे घर पहुती त सभ मानी खाई पाहिंजे-पाहिंजे कमरन में वजी करे आरामी थ्य हुया, कहंखे शायद हुन जो इन्तज़ार ही न रह्यो हो. ससु सहुरो ऐन नशे में धुत पति जो कड़न्ह निंड मां जगयों ई न हो॰  सभ खाई सुम्ही प्या हुया। अकेलो मानी खाईंदे रमा खे लगो त हूअ खुद अनाथ थी वई हुई . हुनजी ज़िमेदारियुन जो बारु वंडन वारो को ब कोन हो। कमाए करे घर जे भातियुन लाइ बिन वेलन जो जुगाड़ करण,  घर संभालण, ऐन बियन केतरियुन दुश्वारियुन माँ गुजरणों पवंदों हो हुनखे …!

      सोच जी कड़ी तड़न्ह टुटी जड़न्ह हुनजो डहन सालन जो पुट अखयूं महटीदों  रसोईघर में हुनजे पासे में अची वेठो॰ माऊ जी खाली अखयून में दिसंडे चयाईं “ अम्माँ तोखे अनाथ बार एतरा प्यारा थी व्या आहिन जो तो मूंखे ब अनाथ करे छडयो aahe. मून ब मानी ण खाधी आहे, घणी बुख लगी आहे, मूंखे ब पाण सां गड़ु मानी खाराइ !”

देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | مَي 28, 2012

प्रवचन

प्रवचन

महात्मा प्रवचन करते ही रहे, काफी देर के पश्चात बीच बीच में एक एक करके बहुत महिलाएं उठ कर कटी रहीं। जब तक घंटे पश्चात उन्होने प्रवचन समाप्त किया तो देखा की फकत एक महिला सब्र का दुशाला ओढ़े, बड़े धीरज के साथ बैठी उसे तक रही है। उसे देखते ही महात्मा बोले “बहन बड़ी देर हो गयी है, तुम भी चली जाती !”                                                                                                                                                                                                                                                                               महिला ने आँखें झुकाकर कहा “महाराज चली गई होती, पर आप जिस चटाई पर बैठे है, मुझे वह लेकर जानी है।“

 देवी नागरानी

Posted by: Devi Nangrani | مَي 28, 2012

भीख

मुल्ला नसरुद्दीन होजा तुर्की,  घर जी छित ते कम करे रह्यो हो, अहड़े वक़्त हिकु भिखारी रस्ते तां  आवाज डींदे चयो ,” मुल्ला साहब, हिकु भेरों हेठ अचो। ”

नसीरुद्दीन छित ताँ लही रस्ते ते आयो, भिखारीअ चयुस “थोड़ी भीख डींदा, मुल्ला साहब ”

“तो इहा गाल्ह चवण लाइ मुखे छित ताँ हेठ अचण लाइ चयो?’

भिखारीअ हिचकिचाहट सां चयो ” माफ़ कजो मुल्ला साहब , तेज आवाज में भीख घुरण में शर्म ईन्दो  आहे.’

“हुं…त तूँ मूसां गड़ु छित ते हलु .’

भिखारीअ सां गड़ु टे माड़ा डाकरियूं चड़ी छत ते पहुचण खाँ पोइ नसीरुद्दीन चयो ,’चंगो हाण तूँ वजी सघीं थो ,भीख-वीख कुछ न मिलंदई “

साभार: हिन्दी कुंज

सिंधी अनुवाद: देवी नगरानी

Posted by: Devi Nangrani | مارچ 25, 2012

हुन लाइ

लेखक: सुरेश शर्मा

सिन्धी अनुवाद: देवी नगरानी                                                                            

थाणे जे आराम कक्ष में सुंदर सलोने शरीर, आकर्षक चहरे वारी आदिवासी हसीना जे पासे में लेटयल थानेदार, नशे जी मदहोशीय में पुच्छ्यो  “ सुखिया पाहिंजे पड़ोसीअ किशिन जे छेड़-छाड़ करण ऐ तुहिंजों हथु पकरण ते तो ज़ोर सा चिलायो, जो तुहिंजों पति निंड माँ उथी खड़ों थ्यो। किशिन खे तुहिंजों हथु पकड़ींदों डिसी होश विजाए वेठो।  आगयां प्यल काठ सां हुन ते ईंअ वार कयाईं जो हू उतेई ढेर थी व्यो। इहाई गाल्ह आहे न ?”

“जी साब “ पर …..हाण माँ तो साण ….!”

“तड़न्ह इज्ज़त लाइ रुनस एं ज़ोर सां  चिलायुम”  पोइ उदास स्वर में चयाईं …”हाण सुहाग जी ख़ातिर खामोश आह्याँ साहब….!”

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